Tuesday, 2 June 2015

पुरुष बन क्या करना विमर्श

आखिर तुम पुरुष ही सिद्ध हुए ,
पति बन के भी तुम पुरुष पहले रहे ,
दोनों ही स्थिति में ,
तुम्हारे लिये ,
औरत......
उपभोग की वस्तु है ,
तन मरे या मन,
क्या सोचना क्या करना विमर्श,
कभी सोचा तुमने,
कितनी विवशताएँ जकड़ती मुझे,
तुम्हारा इंतजार करना,
कितना सताता  मुझे,
तुम सन्देश भेजते,
मैं  आस संजोती ,
निराशा थाती बनती मेरी,
सालों साल गुजरते जाते,
तुम  आते -आते आ न पाते,
भेड़ियें अब तो गांव के सीमा के भीतर,
 बाड़ तक आ पहुंचे हैं,
कितने तो गांव के भीतर डेरा जमाये है,
डर लगता अब मुझे,
मन करता विरोध,
फिर भी धमकी सहती हूँ,
घर-परिवार-बच्चों की खातिर,
तैयार होना है समर्पण को,
मुझे खाके तृप्त हो शांत हो सके. 
तुम आ जाओ ......
पुत्र-पति-पिता बनके,पुरुष बनके नहीं,
तृप्तता उसकी कब खत्म हो जाये कौन जाने,
क्या मैं फिर तैयार हो सकुंगी,
अपने को निवाला  बनते  देखने।

Saturday, 16 May 2015

कहानी--और हार गई जिन्दगी

         बरसात का उतरता मौसम,कभी उमस,कभी ठण्ड का अहसास करवाता है। रात में देर से आँख लगी थी तो ऐसे में सुबह नींद थोड़ा ज्यादा ही सताती है। तेज घंटी की आवाज उनींदी आँखे खुलने से और कान का साथ देने से इंकार कर रहे थें पर लगातार बजती घंटी की आवाज उठकर दरवाजा खोलने पर मजबूर कर दी। दरवाजा खोल ठीक से देख भी न पाई थी की आवाज आई " आंटीजी मम्मी आज काम करने नहीं आयेगी।" क्यों क्या हुआ फोटो जो तुम्हारी मम्मी काम करने नहीं आयेगी,नींद के झोंको में डोलती मैं पूछी। "मम्मी रात मर गई,अभी भी हॉस्पिटल में ही तो है भैया मेरा बोला की जाओ आंटी को बोल आओ नहीं तो मम्मी का इंतजार करेगी,तो मैं आ गई।" उसकी बात को सुनने,समझने और उसके बाद स्वीकार करने में मेरा शरीर,मन सभी जागृत हो गये। वो बच्ची सच्चाई को भावविहीन बयां कर रही थी और मैं अवाक्,निश्चल खड़ी  थी। काफी देर बाद मैं वस्तुस्थिति से तालमेल बैठा पाई। "फोटो क्या हुआ था,कैसे तुम्हारी मम्मी मर गई,कब हुआ ये सब ,तुम्हारी मम्मी कल शाम तो काम करके गई है मेरे घर से।"  हालाँकि बोलते हुए भी मैं बखूबी जानती हूँ कि रातभर का क्या,जिंदगी गंवाने में वक़्त ही कितना लगता है। मैं ज्यादा बोल नहीं पा रही थी ,दुःख के कारन जिव्हा बैचनी में तालू से सटा जा रहा था। "जानती हैं आंटीजी माई रात जीजा के साथ दारू पी  रही थी,बहुत पी ली थी किसी का नहीं सुन रही थी ,जीजा से किसी बात का झगड़ा हो गया था,जीजा भी खूब गुस्सा हो गया था। माई भी खूब चिल्ला रही थी,जीजा कुल्हारी उठा माई को काट दिया। भैया माई को ठेला पे लाद के हॉस्पिटल लाया पर माई १-२ घंटे में ही मर गई।"मैं दुःख से कातर हुई जा रही थी पर वो छोटी बच्ची शायद समझ भी नहीं पा रही थी कि क्या हो गया है। उसके साथ भगवान कितना बड़ा अन्याय कर दिये हैं। कदाचित सड़क पे पलती जिंदगी  यूँही बेभाव पल जाती है। जिंदगी हो या और कुछ,संवरने में ज्यादा वक़्त लगता है बिगड़ने के लिए कुछ ही वक़्त काफी है। 
                         उस बच्ची फोटो के जाने के बाद  दरवाजा बंद कर वही दीवान पे बैठ गई। दुःख-बैचनी के कारन नींद आँखों से उड़ गई थी। उसकी जगह पिछली सारी  बातें जेहन को उकेरने  लगा। ३साल भी तो अभी पुरे नहीं हुए हैं। यहाँ क्वार्टर में शिफ्ट करने पर दाई की खोज कर रही थी। नई जगह है मेरे लिए पूछने पे पता चला की कॉलोनी के सामने सड़क के उस पार दाइयों की भरी-पूरी बड़ी सी बस्ती है।  यहाँ बैठके बुलवाने की जगह सुबह उठके टहलते हुए मैं ही चली गई थी बस्ती में। बस्ती का पहला घर कालिया का ही था। हाँ जिसकी बात मैं कर रही हूँ उसका नाम कालिया ही था। माँ-बाप ने आबनूसी रंग देखकर ही काली नाम रखा जो कालक्रम में पुकार में कालिया हो गया। ऊँचा -लम्बा,भरा-पूरा शरीर,ऊँचा कपाल,छोटी सी नाक। हँसने पे पीले लम्बे दांत निकल जाते थें। एक दन्त में थाती के तौर पर चांदी जड़ा था। मैं जिसवक़्त वहां पहुंची वो पूरा चिल्लाके किसी को गाली दे रही थी। मुझे सामने देखते मुँह बंद कर ली। तुम्हारे बस्ती में कोई दाई मिलेगी क्या?मैं  कॉलोनी के बड़े क्वार्टर . में शिफ्ट की हूँ। सुनते ही चेहरे पे स्मित आ गई। "हाँ दीदी क्यों नहीं,बहुत सारी है पर हम भी काम करते हैं,आप क्यों आई हैं ड्राइवर से बुलवा लिया होता। हम १० बजे तक आ  जायेंगे काम करने।" मैं लौट आई पर पेशोपेश में पड़ गई। डर लग रहा था इतनी कर्कश और इतनी खूंखार,भगवान जाने कैसा काम करेगी। १० बजे से इंतजार कराके ११ बजे वो आई और फिर कल शाम तक आते रही। मतलब अपनी मौत आने के पहले तक वो मेरे साथ अपना दायित्व और साथ निभाते रही है। इन कुछेक सालों में ही मैं उसे पूरी तरह पहचान गई थी। वो मेरे इतने करीब आ गई थी कि कोई काम करनेवाली भी आ सकती है विश्वास नहीं आ रहा है। गले में कुछ अटक सा गया है उसके हमेशा के लिये चले जाना सोचकर। 
                           काले रंग के भीतर एक जागरूक और सफ़ेद चरित्र था उसका। समय पे आना,मन लगाके साफ काम करना। न चोरी-चमारी ना ही किसी तरह का लालच। मैं उसे निरख़्ती थी तो वो भी मेरी अन्यमस्कता धीरे-धीरे पहचानती गई,फिर मेरे मेरे करीब आते गई थी और कितने सारे काम खुद ब खुद करने लगी थी। मैं उसके गुणों पर मुग्ध रहती थी। कितना उठाके उसे दे दूँ समझ नहीं आता था। मन मिलते गया और काफी हदतक वो दोस्त जैसी होते गई। जबतक उससे घण्टों गप्प ना कर लूँ  ,मन ही नहीं लगता था। 
,फिर धीरे-धीरे ये गप्प मन लगाने और कामकाज से ऊपर उठ सामाजिक सरोकार तक पहुँच गया।मुझे तो घर-गृहस्थी से इतर कुछ करने नहीं दिया गया तो मैं कलिया के पीठ पर खड़ी उससे कुछ-कुछ करवाते जा रही थी।  खली समय में उसे अक्षरज्ञान करवाती थी ,गिनती-पहाड़ा रटवाती थी कि कुछ मूलभूत ज्ञान उसे हो जाये। दिमाग की भी कलिया  काफी तेज थी।  कुछ महीनो में ही कितनी आत्मसात कर ली ,कितना कुछ सीख गई थी। शब्द-शब्द मिलाके किताब,अख़बार पढ़ना सीख गई थी। सोचके खुद पे हंसती थी कि कोई घर के कामो के लिये दाई  रखती है,मैं उससे गप्प मारने,कुछ सीखाने,कुछ सीखने की भी अपेक्षा रखने लगी थी। किसी कारणवश एकदिन भी नहीं आई  तो मन दूसरी तरफ लगाना पड़ता था। बहुत कुछ बताती थी कलिया अपनी बस्ती की,रीति-रिवाजों कि, संस्कारों  की। गरीबी और अभावों के भीतर भी एक जूझती जिंदगी होती है जो चलती रहती है और परवान भी चढ़ती है। 
                         कलिया को दारू से सख्त चिढ थी जबकि इनलोगों में तो औरतें भी जोशोखरोश से दारू पीती  है। "जानती हैं दीदी मेरे ७ बच्चे हैं,५ बेटा और २ बेटी। मेरे पति को पीने  से फुर्सत ही नहीं है। जो कभी-कभी कमाता है दारू पी कर उड़ा देता है,फिर मेरे कमाई पर भी हाथ साफ करना चाहता है। हमलोगों में मर्द नहीं भी कमा के निश्चिन्त रहता है कि हमारी औरतें घर और बच्चा सम्भाल लेंगी। मैं  दीदी खूब लड़ती हूँ,बस्ती की सभी औरतों को बोली हूँ कि विरोध करो ,कमाके लाओ तो रोटी खाओ,दारू पीओ। लेकिन औरतें मार से डर जाती है।" मैं  भी साहस का पाठ पढ़ाती कि तुम सभी एक होके रहो,अपना दुःख साझा करो,किसी को उसका पति पीटता है किसी भी वक़्त,तुम सभी मिलके उसे पीटो,अधमुआ करके बस्ती के बाहर खदेड़ दो,तीमारदारी मत करो। यदि सच में इनलोगों के मर्द रोज़-रोज़ दारू पीना बंद कर पैसा घर लाएं तो दोनों की कमाई इतनी अच्छी राशि के रूप में नज़र आएगी कि ये लोग काफी आराम और शानोशौकत से रह सकेंगे। 
                      कलिया की हिम्मत,बुद्धि,कुशाग्रता पे मुग्ध होती मैं उसे आगे की प्लानिंग सिखलाती। कलिया को साफसुथरा रहना,घर बच्चों को सम्भालना ,औरत के स्वास्थ से जुडी जानकारी ,फैमिली प्लानिंग बगैरह सिखलाती और बोलती जाओ अपने बस्ती में सभी को सिखलाओ। कलिया स्फूर्ति,जागरूकता के साथ बाकायदे सभी का क्लास लेती। "देखो दीदी ५ मर्द को मैं भी तो पैदा की हूँ,१ पति है,२ दामाद है जो बगल में ही झोपडी डाल लिया है। सोचिये अभी से नहीं चेतूँगी तो ये ८ मर्द बैठके दारू पियेगा,मेरी बहु-बेटी कमाएगी भी और मार भी खायेगी। पति को तो इतना धिक्कार के रखी  हूँ कि मज़ाल है जो मुझे मार ले।"
                           वक़्त गुजरते जा रहा था। कलिया से एक तादात्म्य स्थापित हो गया लगता था। उसको माध्यम बना मैं गौरवान्वित महसूस करती थी। ४-५ महीनो के लिए कुछ कार्यवश मुझे ससुराल जाना पड़ा,कलिया के ऊपर ही घर की सभी जिम्मेवारियाँ सौप के। इतने सुथरे ढंग से वो सभी काम करने लगी कि मैं भी स्थिर हो के सभी काम निपटा के ही लौटी। आने पे लगा कि कलिया कुछ मुरझाई,उदास,खोई-खोई सी है पर अपनी व्यस्तता में उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई। कुछ दिनों के बाद काम करने आई तो मैं चौंक गई .....कलिया के पैर लड़खड़ा रहे थें,बोली लटपटा रही थी। अपनी आँखों पे मुझे खुद विश्वास नहीं हो रहा था। आँधियाँ सी चलने लगी दिमाग में की ऐसा क्या हुआ होगा आखिर कि कलिया बेलन के बदले बोतल उठा ली। फिर कलिया हमसे कटने लगी,मुँह चुराने लगी। अपने बदले बहु को काम करने भेजने लगी। बहु से ही मैं बहुत कुछ जान पाई थी। जो कलिया मेरे आत्मबल के आधार पर अपने पति और समाज के सामने तन के खड़ी हो गई थी,मेरे न रहने पर वो अपने बेटों और दो  दामाद  के सामने हार गई। मर्द के समाज में औरत सिद्ध हो कमजोर पड़ गई,फिर कमजोरी गले लगाके बिखर गई। एक जीती हुई बाज़ी क्रमशः वो हारने लगी। जीत हार  में जब पूर्णतः हो गई,वो दुनिया छोड़ गई। इतनी हिम्मती होके क्यों तुम कलिया कायर हो गई। अभावों की खाई पाटके  भरीपुरी जिंदगी तुम खुद बनाई फिर क्यूँ मुँह फेर ली। 
               शायद उसके रूप में मैं हार चुकी हूँ। मेरा आत्मबल भी कही गिरवी रह गया। मेरी ख़ुशी,उत्साह से लबरेज दिनचर्या खत्म हो चुकी है।  

Saturday, 11 April 2015

कविता--नारी मुक्ति का दर्द





दिलकश चेहरे के पीछे,
दर्द का सागर लहराता है,
औरत कभी माँ-बहन बनती,
कभी डाकिन-शाकिन शब्दों से सुशोभित होती,
कैसी बिंडबना है,
इस पुरुष के समाज में,
उसकी प्रतिस्पर्धा सिर्फ औरत से ही है,
आगे-पीछे,अगल-बगल,
कहीं भी बढ़ने में उसे,
एक औरत से ही मात खानी है,
पुरुष तो ऊपर की सोपान पर बैठा,
सर्वोत्तम था,है और कदाचित रहेगा,
वो बखूबी जानता है,
कि तुम्हे कैसे निर्बल बनाना है,
तुम गर समर्थ हो गई,
अपने को पहचान गई,
सदियों की सुनियोजित षडयंत्र को जान गई,
पुरुष की सत्ता को तुम्हारी चुनौती,
नेस्तनाबूद कर देगी,
और फिर यातना से नारीमुक्ति,
का युग,दूर नहीं रह जायेगा। 

Saturday, 14 March 2015

कहानी---सच्चा रिश्ता

      बौखलाये चिढ़े से  "विपिन" सारे  घर में चहलकदमी करते जा रहे हैं "क्या पड़ा था तुम्हे इन झंझटों में पड़ने का ,प्यार को क्रियान्वित करके रिश्तों में तब्दील करने का। मुझसे भी अपनी जिद्द पूरा करवा लेती हो। समय-पैसा-मेहनत  सभी लग रहे हैं। कितने दिनों से इन्ही सब में फंसा हुआँ हूँ तो ऑफिस से भी छुट्टी मिलने में दिक्कत सो अलग।"   निशब्द,निर्निमेष आँखों से देखती नेहा बिलकुल चुप है। ठीक ही तो बोल रहे हैं विपिन ,सब समझ रही है वो। कोर्ट में तारीख भी जल्द पड़नेवाली है। ज्यादा कुछ नहीं होगा बखूबी पता है उसे पर बखेड़ा तो हो ही गया है। ओह!कैसी है ये दुनिया ?अच्छा करने चलो और बुरे का श्रेय सर माथे आ गिरता है नेहा खुद महसुस करती है कि उसकी कम उम्र की भावनायें बुद्धि से परे दिल पर हावी रहती थी। प्यार मिलने पर अभिभूत सी रहती थी वो। 
             नई शादी हुई थी। विपिन के साथ आई थी यहाँ किराये के फ्लैट में। बड़ा शहर ,अकेली घबड़ाई सी रहती थी,मन नहीं लगता था। सामनेवाले फ्लैट में" मेहरासाहेब" रहते थें जो कुछ दिनों में ही मेरे मेहराअंकल  हो गए थें। उनके घर में मेहराआंटी,तीन किशोर से जवान होते बच्चे और उन बच्चों के दादाजी -दादीजी। मेरी छोटी उम्र थी,नई उमंग,ढेर सारे सपने और सच्चा दिल था। उनलोगों से खूब प्रेम से मिली और वेलोग भी बड़े प्रेम से मुझे अपनायें थें। दादाजी-दादीजी तो शायद अपने पोता-पोती से ज्यादा मुझे प्यार करने लगे थें। काफी हँसता-बोलता परिवार था,मैं  इतना घुलमिल गई थी कि सब अकेलापन भूल गई थी। दादाजी-दादीजी तो इतना प्यार करते थें कि अपने मम्मी-पापा,घर भूल गई थी ,उनका घर मेरा दूसरा घर हो गया था। समय अपने गति से अनवरत गुजरते जा रहा था। मेहराअंकल के तीनो बच्चे आगे की पढाई के लिये बाहर चले गयें थें। मैं  भी एक बच्चे की माँ हो गई थी। यहाँ-नैहर-ससुराल-मेहराअंकल का घर.....मेरी जिंदगी इसमें गुजर रही थी और मैं प्रसन्नता से समय काट रही थी। मैं अपनी जिम्मेवारियों में व्यस्त होते जा रही थी पर इस व्यस्तता में भी दादा-दादीजी के पास घंटों समय न गुजारूं तो मुझे चैन नहीं आता था। 
                 ईधर कुछ दिनों से मुझे अहसास होने लगा था कि उनके यहाँ  संदेहास्पद सा कुछ चल रहा है लेकिन क्या?दादीजी से पूछी तो वे टाल गईं। लेकिन मेहराआंटी के चिल्लाने की आवाज और दादीजी की दबी सिसकी अक्सराँ सुनाई दे जाती थी। कुछ-कुछ समझ आ रहा था मुझे पर  ध्यान नहीं दे पाती थी। विपिन को ये सब बताई तो वे तुरन्त मुझे सहेजने लगे कि आना-जाना कम करो। मैं कभी-कभी उनके यहाँ जाती थी। मेरी व्यस्तता काफी हो गई थी फिर दूसरा बच्चा भी मुझे होनेवाला था तो तबीयत मेरी ठीक भी नहीं रहती थी। उनके यहाँ ये सब नाटक चलते रहता था। एकदिन वहाँ पहुंची तो देखी मेहराआंटी पुरे जोशोखराम से चिल्ला रही थीं और दादीजी-दादाजी आँख में आँसू लिये देख रहे थें। मैं  अवाक हो सिर्फ इतना ही मुँह खोल पाई "क्या हुआ आंटीजी,इनलोगों से क्या ऐसी गलती हुई की आप इतना चिल्ला रही हैं." बिफर सी गईं मेहराआंटी "कौन होती हो तुम ,क्या मतलब है तुम्हे हमारे पारिवारिक मामलों से। जब देखो तब घुसे रहती हो हमारे यहाँ। "बबाल सी मचा दी आंटीजी। मैं रोते हुए वापस आ गई थी। विपिन सुनके खूब गुस्सा हुए और उनके यहाँ मेरे जाने पे रोक लगा दियें। 
                        दादाजी-दादीजी को देखने ,प्यार पाने की इच्छा बलवती होने लगती थी कभी-कभी। कभी-कभार वेलोग बॉलकनी में नज़र आते तो मैं मुस्कुरा के प्रणाम करती,हाथ हिलाती। वेलोग भी उधर खुश हो लेते थें। मैं फिर मायके चली गई और दूसरे बच्चे को साथ ले ३ महीनो के बाद वापस लौटी थी। काम करनेवाली बाई बताई की मेहरासाहेब अपने माँ-बाबूजी को वृद्धाआश्रम में रख आये हैं। सुनके मन कसैला हो गया पर दूसरी तरफ सुकून भी  मिला की अपने हमउम्रों के बीच तो रहेंगे। कुछ बातें तो कर पायेंगे। यहाँ तो दिनरात मेहराआंटी के अनुशासन में रहके उनकी राजनीती झेलते रहते थें। मेहराअंकल के ऑफिस जाने के बाद जैसा दोहरा-दोगला व्यवहार उनलोगों के साथ करती थी वो तो बन्द हो जायेगा। वे दोनों तो आंटीजी के  डर से अंकल को भी कुछ नहीं बोल पाते थें। 
              शहर में दूसरी तरफ हमलोग फ्लैट खरीदकर शिफ्ट कर गयें थें। समय के गर्त में सबकुछ दबते जा रहा था। एकदिन मैं और विपिन  बाजार में थें तो पुराने मुहल्ले के कुछ्लोग मिल गयें। मैं मेहराअंकल के परिवार के प्रति अपनी आशक्ति को नहीं दबा पाई और उनलोगों के लिये  जिज्ञासा कर बैठी। "मेहरासाहेब के पापा तो गुजर गयें,आश्रम में ही जा के  येलोग  पूरी कामक्रिया कियें। माताजी उनकी वही हैं और कदाचित वही रहें। "सुनकर मन जाने तो कैसा-कैसा होने लगा। इतने दिनों का संचित प्यार इतना उछाल  मारा कि मैं दादीजी के पास वृद्धाआश्रम में पहुँच गई। कैसी सी तो हो गई थी दादीजी। पहचान में नहीं आ रही थीं वे--कमजोर,हताश,उदास सी लग रही थी। मुझे गले लगाके घंटों फूट-फूटकर रोते रही थी। मुँह से सिर्फ एक ही आवाज निकल रहा था की मेरा कोई नहीं है दादाजी के बाद। मैं निर्णय ले चुकी थी बस हकीकत का जामा  पहनाना था। काफी तंग करने,लड़ाई लड़ने के बाद विपिन मेरी बात मान पाये थें। दादीजी से उनकी मर्जी पूछी गई तो तो वे ख़ुशी से रोने लगीं "हाँ मेरी मर्जी है,तुमलोग मुझे प्यार करते हो तो तुमलोग ही न अपने हुए। मुझे परिवार चाहिये, वो ख़ुशी मुझे दे सकते हो तो दे दो,मेरा तुमलोगों के सिवा कोई है मुझे याद भी नहीं रहेगा। "विपिन काफी लिखापढ़ी ,दौड़धूप ,पैरवी कियें। दादीजी का लिखा मत सबों के सामने रखें और फिर अंततः दादीजी को हमलोग अपने घर ले आयें। 

                 बस तूफान बरपा हो गया है। मेहराअंकल -आंटी इसे अपना अपमान समझ आकाश-पाताल एक किये हैं। अफरातफरी का माहौल सृजित किये हैं। मेहराअंकल हमलोगों पे केस कर दिए हैं। आंटीजी घूम-घूम कर सभी को हमलोगों के विरुद्ध उल्टा-सीधा सुनाते रहती हैं। जिसतरह से दादीजी हमारे घर में खुश हैं,बच्चों के साथ चहकते रहती हैं,हमलोगों पे प्यार लुटाते रहती हैं ,उनका लिखा मतपत्र हमारे पास है,कुछ नहीं होनेवाला है। पर विपिन भी अपनी जगह सही डरे हैं कि यदि खून जोर  मारे ,बेटा-पोता-पोती सामने आ खड़ा हुआ और यदि दादीजी उनके पक्ष में आ खड़ी हुईं तो तुम्हारा प्यार,मानवीयता कहाँ रह पायेगा। हालाँकि ऐसा कुछ नहीं होनेवाला,पर  हुआ तो सच में क्या होगा "सच्चा रिश्ता " का। कुछ आगे नहीं सोच पा रही मैं। 


Sunday, 15 February 2015

कहानी--ये कैसा अहसास

मेरी दोस्त एक पुरुष के साथ खड़ी मुझे टोहका मार रही " देखो निशा ये कौन है तुम्हारे सामने खड़ा ?पहचानो,ओह!यार कोशिश तो करो।" मैं याद करने की कोशिश में थक गई। बेबसी में इन्दु  की तरफ निगाह उठाई पर वो तो मज़े लेने के मूड में थी। "गर नहीं पहचानी निशा तो फिर जिन्दगी से शिकायत मत रखना।"मैं अवश थी,लाख याद करूँ,किसी पुरुष की उपस्थिति  मेरी जिंदगी में? कुछ नहीं दिख रहा था। सामने खड़ा पुरुष भी अपनी आँखों में ढेर सारा पहचान,स्नेह लिये आतुर,निर्निमेष मुझे निहार रहा। मुझे बस यही पहचान सूझ रही थी कि सामने एक सुदर्शन पुरुष खड़ा है जिसके व्यक्तित्व और अनाम निमंत्रण के आगे मेरे पपोटे झुक गए हैं। मैं वैसी अवाक्,अवश,अविचल खड़ी  रही और वक़्त गुजर गया। मुलाकात की घडी ख़त्म। 
                                           ग्रेजुएशनका एग्जाम ,परीक्षा हॉल ,एक लड़का जाने कहाँ से मेरा रौल नंबर और नाम जुटा लिया था। हर एग्जाम के दिन बाहर खड़ा वो मेरा इंतजार करता। मेरे आते मेरी सीट बताता फिर अपना सीट पकड़ता। मैं  हर पेपर में तेज बुखार में भूत रहती थी। पेपर बँटने के कुछ देर बाद आके पूछ जाता "ठीक हो न ,आ रहा न सबकुछ ,कुछ दिक्कत होने पे मैं  उधर हूँ।"१२ दिन यही सिलसिला बदस्तूर चला फिर ख़त्म। मेरी दोस्त की बहन का देवर था वो,काफी बाद में मुझे पता चला था। वो बिहार यूनिवर्सिटी में फिजिक्स का टॉपर बना। मैं मनोविज्ञान में यूनिवर्सिटी थर्ड आई। 
                                    उसके जाते इन्दु हँस-हँस के लोटपोट। बेचारा कितनी हसरतें संजो आया था कि तुमसे रूबरू होगा,देखेगा,सुनेगा। जानती है हमेशा बोलता था कि "मैं तो निशा की आवाज ही न सुन पाया था,अब जब भी मिलूँगा जम के बातें  करूँगा। सिविल सर्विसेज के पहले प्रयास में ही सफल होके इनकम टैक्स ऑफिसर   बना। अभी बॉम्बे में पोस्टिंग है। वो तो आगे की तमन्ना भी रख आया होगा,तुम तुषारापात कर दी। मुझे छेड़ने लगी वो और मैं  आत्मग्लानि के मुढ़ावस्था में आ गई। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। जिसे हर चाहे-अनचाहे लम्हों में मैं याद करती आई,बिना किसी पहचान के अपने हर सुख-दुःख का गवाह बनाती रही हूँ। जो दिल के इतने करीब था,उसे मैं क्यों न पहचान पाई। क्या वक़्त मुझे मर्यादा में रख संभाल गया?
                                     वक़्त गुजरते जाती है,अपने दामन में कुछ अनकही गाथा रख छोड़ती है। कहते हैं न कि जिंदगी एकबार अतीत के साथ जरूर लौटती है। १२ दिनों को आज १२ मिनटों में दिखा तमाम खुशियों को दामन में बिखरा चली गई है। कौन कहता है कि खुशियाँ बटोरने के लिये उम्र चाहिये। ये तो पल-दो-पल की सौगात होती है। बिना किसी शब्दों के आँखों में वो १२ मिनट बस गए हैं। प्यार से भी खूबसूरत अहसास हैं। कोई तो दिल है कहीं जो मेरे नाम से लरज जाता होगा। उसकी दुआओं में मेरे अक्श तो होते होंगे। मेरे हर पल में जैसे वो साथ चलता रहा ,मैं  भी उसके साथ रही,सोच रोमांच हो रहा है। जिंदगी में और चाहिए भला क्या?
                                   मेरी दोस्त उसे सब बता उसकी गलतफहमियाँ दूर कर दी होगी। जानती हूँ बुलाने पे दौड़ा चला आयेगा। जिंदगी शायद मोहलत भी दे जाय। पर क्यूँ भला?काहे  सोवत निंदिया जगाये। 

Tuesday, 27 January 2015

कविता--हवा बहती है

हवा बहती है,
कितने आयामों में,कितने रूपों में,
कभी धीरे से हवा छूती है,
सिहराती है,गुदगुदा सी जाती है,
वर्षा की बूँदों के साथ,
मुलायम,भींगी सी,
ठण्डी,सुकून देती,
हवा कभी आंधी बन धूल उड़ाती,
कभी प्रबल बन विंध्वस कर जाती,
जंगल से जब उठती जोर-शोर से,
प्रचंड बन दौड़ती हवा,
चर्र -चर्र करते झोंके खाते,
टूटते पेड़-टहनियाँ,
मिट्टी खसकाती,हाहाकार करती हवा,
दौड़ती,मेरे आँगन के मुंडेर से टकराती,
सर उठाके देखती,झांकती,
फिर मुलायम पड़ जाती,
मजबूत प्रहार से या कोमल वातावरण से,
धीमे से पसरती,सहलाती,
आँगन से गुजरती मुझे भरमा जाती। 

Monday, 12 January 2015

कविता-- हद में डूबा प्यार

मैं खामोश अंग बनी  बैठी  कायनात की,
ये जंगल,झील,हरियाली,सुरमयता,
तुम कब गए थे उसपार,
मैं सोचते रहती हूँ,
क्या तुम्हे याद है वो तिथि,
तो क्यूँ न फिर आ रहे,
हर सुबह आस जगाती,
दिन इन्तजार में जाती,
शाम अवसाद लेके आती,
रात आँसुओं में भिंगोती,
झील के इसपार हद है हमारी,
तुम्हारी हद ,कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
उसपार है सबकुछ,
तुम जो हो ,
इसपार मेरा प्यार,मेरी तन्हाई,
और हद में समोई मैं।