Saturday, 14 March 2015

कहानी---सच्चा रिश्ता

      बौखलाये चिढ़े से  "विपिन" सारे  घर में चहलकदमी करते जा रहे हैं "क्या पड़ा था तुम्हे इन झंझटों में पड़ने का ,प्यार को क्रियान्वित करके रिश्तों में तब्दील करने का। मुझसे भी अपनी जिद्द पूरा करवा लेती हो। समय-पैसा-मेहनत  सभी लग रहे हैं। कितने दिनों से इन्ही सब में फंसा हुआँ हूँ तो ऑफिस से भी छुट्टी मिलने में दिक्कत सो अलग।"   निशब्द,निर्निमेष आँखों से देखती नेहा बिलकुल चुप है। ठीक ही तो बोल रहे हैं विपिन ,सब समझ रही है वो। कोर्ट में तारीख भी जल्द पड़नेवाली है। ज्यादा कुछ नहीं होगा बखूबी पता है उसे पर बखेड़ा तो हो ही गया है। ओह!कैसी है ये दुनिया ?अच्छा करने चलो और बुरे का श्रेय सर माथे आ गिरता है नेहा खुद महसुस करती है कि उसकी कम उम्र की भावनायें बुद्धि से परे दिल पर हावी रहती थी। प्यार मिलने पर अभिभूत सी रहती थी वो। 
             नई शादी हुई थी। विपिन के साथ आई थी यहाँ किराये के फ्लैट में। बड़ा शहर ,अकेली घबड़ाई सी रहती थी,मन नहीं लगता था। सामनेवाले फ्लैट में" मेहरासाहेब" रहते थें जो कुछ दिनों में ही मेरे मेहराअंकल  हो गए थें। उनके घर में मेहराआंटी,तीन किशोर से जवान होते बच्चे और उन बच्चों के दादाजी -दादीजी। मेरी छोटी उम्र थी,नई उमंग,ढेर सारे सपने और सच्चा दिल था। उनलोगों से खूब प्रेम से मिली और वेलोग भी बड़े प्रेम से मुझे अपनायें थें। दादाजी-दादीजी तो शायद अपने पोता-पोती से ज्यादा मुझे प्यार करने लगे थें। काफी हँसता-बोलता परिवार था,मैं  इतना घुलमिल गई थी कि सब अकेलापन भूल गई थी। दादाजी-दादीजी तो इतना प्यार करते थें कि अपने मम्मी-पापा,घर भूल गई थी ,उनका घर मेरा दूसरा घर हो गया था। समय अपने गति से अनवरत गुजरते जा रहा था। मेहराअंकल के तीनो बच्चे आगे की पढाई के लिये बाहर चले गयें थें। मैं  भी एक बच्चे की माँ हो गई थी। यहाँ-नैहर-ससुराल-मेहराअंकल का घर.....मेरी जिंदगी इसमें गुजर रही थी और मैं प्रसन्नता से समय काट रही थी। मैं अपनी जिम्मेवारियों में व्यस्त होते जा रही थी पर इस व्यस्तता में भी दादा-दादीजी के पास घंटों समय न गुजारूं तो मुझे चैन नहीं आता था। 
                 ईधर कुछ दिनों से मुझे अहसास होने लगा था कि उनके यहाँ  संदेहास्पद सा कुछ चल रहा है लेकिन क्या?दादीजी से पूछी तो वे टाल गईं। लेकिन मेहराआंटी के चिल्लाने की आवाज और दादीजी की दबी सिसकी अक्सराँ सुनाई दे जाती थी। कुछ-कुछ समझ आ रहा था मुझे पर  ध्यान नहीं दे पाती थी। विपिन को ये सब बताई तो वे तुरन्त मुझे सहेजने लगे कि आना-जाना कम करो। मैं कभी-कभी उनके यहाँ जाती थी। मेरी व्यस्तता काफी हो गई थी फिर दूसरा बच्चा भी मुझे होनेवाला था तो तबीयत मेरी ठीक भी नहीं रहती थी। उनके यहाँ ये सब नाटक चलते रहता था। एकदिन वहाँ पहुंची तो देखी मेहराआंटी पुरे जोशोखराम से चिल्ला रही थीं और दादीजी-दादाजी आँख में आँसू लिये देख रहे थें। मैं  अवाक हो सिर्फ इतना ही मुँह खोल पाई "क्या हुआ आंटीजी,इनलोगों से क्या ऐसी गलती हुई की आप इतना चिल्ला रही हैं." बिफर सी गईं मेहराआंटी "कौन होती हो तुम ,क्या मतलब है तुम्हे हमारे पारिवारिक मामलों से। जब देखो तब घुसे रहती हो हमारे यहाँ। "बबाल सी मचा दी आंटीजी। मैं रोते हुए वापस आ गई थी। विपिन सुनके खूब गुस्सा हुए और उनके यहाँ मेरे जाने पे रोक लगा दियें। 
                        दादाजी-दादीजी को देखने ,प्यार पाने की इच्छा बलवती होने लगती थी कभी-कभी। कभी-कभार वेलोग बॉलकनी में नज़र आते तो मैं मुस्कुरा के प्रणाम करती,हाथ हिलाती। वेलोग भी उधर खुश हो लेते थें। मैं फिर मायके चली गई और दूसरे बच्चे को साथ ले ३ महीनो के बाद वापस लौटी थी। काम करनेवाली बाई बताई की मेहरासाहेब अपने माँ-बाबूजी को वृद्धाआश्रम में रख आये हैं। सुनके मन कसैला हो गया पर दूसरी तरफ सुकून भी  मिला की अपने हमउम्रों के बीच तो रहेंगे। कुछ बातें तो कर पायेंगे। यहाँ तो दिनरात मेहराआंटी के अनुशासन में रहके उनकी राजनीती झेलते रहते थें। मेहराअंकल के ऑफिस जाने के बाद जैसा दोहरा-दोगला व्यवहार उनलोगों के साथ करती थी वो तो बन्द हो जायेगा। वे दोनों तो आंटीजी के  डर से अंकल को भी कुछ नहीं बोल पाते थें। 
              शहर में दूसरी तरफ हमलोग फ्लैट खरीदकर शिफ्ट कर गयें थें। समय के गर्त में सबकुछ दबते जा रहा था। एकदिन मैं और विपिन  बाजार में थें तो पुराने मुहल्ले के कुछ्लोग मिल गयें। मैं मेहराअंकल के परिवार के प्रति अपनी आशक्ति को नहीं दबा पाई और उनलोगों के लिये  जिज्ञासा कर बैठी। "मेहरासाहेब के पापा तो गुजर गयें,आश्रम में ही जा के  येलोग  पूरी कामक्रिया कियें। माताजी उनकी वही हैं और कदाचित वही रहें। "सुनकर मन जाने तो कैसा-कैसा होने लगा। इतने दिनों का संचित प्यार इतना उछाल  मारा कि मैं दादीजी के पास वृद्धाआश्रम में पहुँच गई। कैसी सी तो हो गई थी दादीजी। पहचान में नहीं आ रही थीं वे--कमजोर,हताश,उदास सी लग रही थी। मुझे गले लगाके घंटों फूट-फूटकर रोते रही थी। मुँह से सिर्फ एक ही आवाज निकल रहा था की मेरा कोई नहीं है दादाजी के बाद। मैं निर्णय ले चुकी थी बस हकीकत का जामा  पहनाना था। काफी तंग करने,लड़ाई लड़ने के बाद विपिन मेरी बात मान पाये थें। दादीजी से उनकी मर्जी पूछी गई तो तो वे ख़ुशी से रोने लगीं "हाँ मेरी मर्जी है,तुमलोग मुझे प्यार करते हो तो तुमलोग ही न अपने हुए। मुझे परिवार चाहिये, वो ख़ुशी मुझे दे सकते हो तो दे दो,मेरा तुमलोगों के सिवा कोई है मुझे याद भी नहीं रहेगा। "विपिन काफी लिखापढ़ी ,दौड़धूप ,पैरवी कियें। दादीजी का लिखा मत सबों के सामने रखें और फिर अंततः दादीजी को हमलोग अपने घर ले आयें। 

                 बस तूफान बरपा हो गया है। मेहराअंकल -आंटी इसे अपना अपमान समझ आकाश-पाताल एक किये हैं। अफरातफरी का माहौल सृजित किये हैं। मेहराअंकल हमलोगों पे केस कर दिए हैं। आंटीजी घूम-घूम कर सभी को हमलोगों के विरुद्ध उल्टा-सीधा सुनाते रहती हैं। जिसतरह से दादीजी हमारे घर में खुश हैं,बच्चों के साथ चहकते रहती हैं,हमलोगों पे प्यार लुटाते रहती हैं ,उनका लिखा मतपत्र हमारे पास है,कुछ नहीं होनेवाला है। पर विपिन भी अपनी जगह सही डरे हैं कि यदि खून जोर  मारे ,बेटा-पोता-पोती सामने आ खड़ा हुआ और यदि दादीजी उनके पक्ष में आ खड़ी हुईं तो तुम्हारा प्यार,मानवीयता कहाँ रह पायेगा। हालाँकि ऐसा कुछ नहीं होनेवाला,पर  हुआ तो सच में क्या होगा "सच्चा रिश्ता " का। कुछ आगे नहीं सोच पा रही मैं। 


Sunday, 15 February 2015

कहानी--ये कैसा अहसास

मेरी दोस्त एक पुरुष के साथ खड़ी मुझे टोहका मार रही " देखो निशा ये कौन है तुम्हारे सामने खड़ा ?पहचानो,ओह!यार कोशिश तो करो।" मैं याद करने की कोशिश में थक गई। बेबसी में इन्दु  की तरफ निगाह उठाई पर वो तो मज़े लेने के मूड में थी। "गर नहीं पहचानी निशा तो फिर जिन्दगी से शिकायत मत रखना।"मैं अवश थी,लाख याद करूँ,किसी पुरुष की उपस्थिति  मेरी जिंदगी में? कुछ नहीं दिख रहा था। सामने खड़ा पुरुष भी अपनी आँखों में ढेर सारा पहचान,स्नेह लिये आतुर,निर्निमेष मुझे निहार रहा। मुझे बस यही पहचान सूझ रही थी कि सामने एक सुदर्शन पुरुष खड़ा है जिसके व्यक्तित्व और अनाम निमंत्रण के आगे मेरे पपोटे झुक गए हैं। मैं वैसी अवाक्,अवश,अविचल खड़ी  रही और वक़्त गुजर गया। मुलाकात की घडी ख़त्म। 
                                           ग्रेजुएशनका एग्जाम ,परीक्षा हॉल ,एक लड़का जाने कहाँ से मेरा रौल नंबर और नाम जुटा लिया था। हर एग्जाम के दिन बाहर खड़ा वो मेरा इंतजार करता। मेरे आते मेरी सीट बताता फिर अपना सीट पकड़ता। मैं  हर पेपर में तेज बुखार में भूत रहती थी। पेपर बँटने के कुछ देर बाद आके पूछ जाता "ठीक हो न ,आ रहा न सबकुछ ,कुछ दिक्कत होने पे मैं  उधर हूँ।"१२ दिन यही सिलसिला बदस्तूर चला फिर ख़त्म। मेरी दोस्त की बहन का देवर था वो,काफी बाद में मुझे पता चला था। वो बिहार यूनिवर्सिटी में फिजिक्स का टॉपर बना। मैं मनोविज्ञान में यूनिवर्सिटी थर्ड आई। 
                                    उसके जाते इन्दु हँस-हँस के लोटपोट। बेचारा कितनी हसरतें संजो आया था कि तुमसे रूबरू होगा,देखेगा,सुनेगा। जानती है हमेशा बोलता था कि "मैं तो निशा की आवाज ही न सुन पाया था,अब जब भी मिलूँगा जम के बातें  करूँगा। सिविल सर्विसेज के पहले प्रयास में ही सफल होके इनकम टैक्स ऑफिसर   बना। अभी बॉम्बे में पोस्टिंग है। वो तो आगे की तमन्ना भी रख आया होगा,तुम तुषारापात कर दी। मुझे छेड़ने लगी वो और मैं  आत्मग्लानि के मुढ़ावस्था में आ गई। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। जिसे हर चाहे-अनचाहे लम्हों में मैं याद करती आई,बिना किसी पहचान के अपने हर सुख-दुःख का गवाह बनाती रही हूँ। जो दिल के इतने करीब था,उसे मैं क्यों न पहचान पाई। क्या वक़्त मुझे मर्यादा में रख संभाल गया?
                                     वक़्त गुजरते जाती है,अपने दामन में कुछ अनकही गाथा रख छोड़ती है। कहते हैं न कि जिंदगी एकबार अतीत के साथ जरूर लौटती है। १२ दिनों को आज १२ मिनटों में दिखा तमाम खुशियों को दामन में बिखरा चली गई है। कौन कहता है कि खुशियाँ बटोरने के लिये उम्र चाहिये। ये तो पल-दो-पल की सौगात होती है। बिना किसी शब्दों के आँखों में वो १२ मिनट बस गए हैं। प्यार से भी खूबसूरत अहसास हैं। कोई तो दिल है कहीं जो मेरे नाम से लरज जाता होगा। उसकी दुआओं में मेरे अक्श तो होते होंगे। मेरे हर पल में जैसे वो साथ चलता रहा ,मैं  भी उसके साथ रही,सोच रोमांच हो रहा है। जिंदगी में और चाहिए भला क्या?
                                   मेरी दोस्त उसे सब बता उसकी गलतफहमियाँ दूर कर दी होगी। जानती हूँ बुलाने पे दौड़ा चला आयेगा। जिंदगी शायद मोहलत भी दे जाय। पर क्यूँ भला?काहे  सोवत निंदिया जगाये। 

Tuesday, 27 January 2015

कविता--हवा बहती है

हवा बहती है,
कितने आयामों में,कितने रूपों में,
कभी धीरे से हवा छूती है,
सिहराती है,गुदगुदा सी जाती है,
वर्षा की बूँदों के साथ,
मुलायम,भींगी सी,
ठण्डी,सुकून देती,
हवा कभी आंधी बन धूल उड़ाती,
कभी प्रबल बन विंध्वस कर जाती,
जंगल से जब उठती जोर-शोर से,
प्रचंड बन दौड़ती हवा,
चर्र -चर्र करते झोंके खाते,
टूटते पेड़-टहनियाँ,
मिट्टी खसकाती,हाहाकार करती हवा,
दौड़ती,मेरे आँगन के मुंडेर से टकराती,
सर उठाके देखती,झांकती,
फिर मुलायम पड़ जाती,
मजबूत प्रहार से या कोमल वातावरण से,
धीमे से पसरती,सहलाती,
आँगन से गुजरती मुझे भरमा जाती। 

Monday, 12 January 2015

कविता-- हद में डूबा प्यार

मैं खामोश अंग बनी  बैठी  कायनात की,
ये जंगल,झील,हरियाली,सुरमयता,
तुम कब गए थे उसपार,
मैं सोचते रहती हूँ,
क्या तुम्हे याद है वो तिथि,
तो क्यूँ न फिर आ रहे,
हर सुबह आस जगाती,
दिन इन्तजार में जाती,
शाम अवसाद लेके आती,
रात आँसुओं में भिंगोती,
झील के इसपार हद है हमारी,
तुम्हारी हद ,कहाँ शुरू कहाँ खत्म,
उसपार है सबकुछ,
तुम जो हो ,
इसपार मेरा प्यार,मेरी तन्हाई,
और हद में समोई मैं।  

Thursday, 1 January 2015

कविता--तुम्हारी याद

तेरी हर यादों को,
बायें हाथ की,
मुठ्ठी में बांधे हूँ,
फिर तेरी याद मुझसे,
क्यूँ जूझ रही है,
सारी उंगलियां तनतना रही है,
दीपावली आनेवाली है न,
हर उत्सव को बहाना बना,
तुम क्यूँ याद आने की,
कोशिश करते रहते हो,
दीये की झिलमिलाती लौ में,
तुम जब मुस्कुराते हो,
कभी सोचा .......
मैं कितनी मायूस हो जाती हूँ,
बिखरती-बिसूरती,तुम्हारी यादों मे,
मुठ्ठी कसमसाती है,
क्यूँ भला आज़ाद करूँ ?
तुम्हारी यादों को,
जो एक पल में ही,
मेरे सारे वजूद को,
आँसुओं में भिंगो जाता है। 

Sunday, 30 November 2014

कविता--कास के फूल

कास खिले हैं,खिले पड़े हैं,
मैदान के मैदान,
उजळें,रुई से फाहे-रेशमी,सुनहलें,
छू जाये तो सिहरन से भर जायें,
ये यूँ सृष्टि को अलंकृत किये,
मानो वर्फ से ढँका कायनात,
आवरण इतना सज्जित,
इतने प्यारें,इतने न्यारें,
इतनी शोभा,इतनी सुषमा,
शानदार धरोहर कायनात की,
अठखेलियाँ करते आपस में,
हल्की हवाओं के साथ सभी सर झुकाते,
हँसते तो सर्र-सर्र घण्टियाँ सी बजती,
कोई सर उठाके आकाश से प्रतिस्पर्धा करता,
कोई सर झुकाके धरती का प्यार पाता,
ये कैसी रचयिता की रचना,
पुरे,सारे बिखर जायेंगे,
कैसी देन दाता की,
एक को विदा दो,तब दूसरी का स्वागत करो,
कहते हैं न---
कास खिलें ,मतलब  बरसात गया। 

Monday, 10 November 2014

कविता----जंगल अंतस की

जंगल से गुजरते सोच रही,
चलते देख रही,
जंगल सम्मोहित करता है,
पेड़ -दर-पेड़,दरख्त के फैले सिलसिले,
चर्र-चर्र करती हरी-पीली-लाल पत्तियाँ,
कुछ नवीन-कुछ पुराने,
कुछ पात-कुछ कोपलें,
कुछ आवाज़ें जो फिर-फिर आपको बुलाती है,
जंगल बोलता है,
सर्र-सर्र की आवाज,
ओह!सूं-हाँ की आवाज,
कानो से सटके गुजरती झोंके की आवाज,
कुछ ढूंढती,कुछ बिखरती ,कुछ याद सी आती आवाजें,
जंगल गुनगुनाता है ,जंगल गाता है,
जंगल भटकाता है,जंगल राह  भी दिखा जाता है,
जंगल अंतस में भटके या हम जंगल में भटके