Thursday, 1 October 2015

कविता--कास के फूल

कास खिले हैं,खिले पड़े हैं,
मैदान के मैदान,
उजळें,रुई से फाहे-रेशमी,सुनहलें,
छू जाये तो सिहरन से भर जायें,
ये यूँ सृष्टि को अलंकृत किये,
मानो वर्फ से ढँका कायनात,
आवरण इतना सज्जित,
इतने प्यारें,इतने न्यारें,
इतनी शोभा,इतनी सुषमा,
शानदार धरोहर कायनात की,
अठखेलियाँ करते आपस में,
हल्की हवाओं के साथ सभी सर झुकाते,
हँसते तो सर्र-सर्र घण्टियाँ सी बजती,
कोई सर उठाके आकाश से प्रतिस्पर्धा करता,
कोई सर झुकाके धरती का प्यार पाता,
ये कैसी रचयिता की रचना,
पुरे,सारे बिखर जायेंगे,
कैसी देन दाता की,
एक को विदा दो,तब दूसरी का स्वागत करो,
कहते हैं न---
कास खिलें ,मतलब  बरसात गया। 

14 comments:

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    1. thnx a lot Rajivji...mai dekh li hun..

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  2. बहुत सुन्दर शब्द चित्र...

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    1. aap mere blog tk aayen...dil se aabhar..

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  3. बहुत सुन्दर रचना , कोई सर उठाके आकाश से प्रतिस्पर्धा करता, कोई सर झुकाके धरती का प्यार पाता, बहुत सुन्दर पंक्तिया , आपने प्रकृति को हिंदी के सुरुचिपूर्ण शब्दों में सहज अन्दाज में बेमिसाल पिरोया है अपर्णा जी

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    1. bahut-bahut aabhar aapke...Nandkishore ji...

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  4. बहुत सुन्दर लिखती हो आप
    कास खिले, मतलब बरसात गया :)

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  5. सुंदर रचना... बिन बरसे लौट गया मॉनसून, खिल गए कास के फूल

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  6. बहुत ही सुंदर रचना प्रस्‍तुत की है आपने।

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